
किसी भी लेखक की रचनायें ही लेखक का प्रतिनिधित्व करतीं है लेकिन उक्त लेखक से जुड़े संस्मरण, रचना यात्रा, निजी संघर्ष भी लेखक की रचनाओं से कम नहीं होता. रेणु जी की रचनावली या परसाई जी की रचनावली में हम सिर्फ उनकी रचनाओं से ही परिचित नहीं होते बल्कि उस समूचे कालखंड की यात्रा कर डालते हैं.
भीष्म साहनी के विभिन्न अवसरों पर लिये गये 27 साक्षात्कारों का संकलन मेरे साक्षात्कार हमें भीष्म साहनी की रचना यात्रा से परिचित कराता है.
बकौल भीष्म साहनी जी, "गप्प शप्प का अपना रस होता है. इस गप्प शप्प में हम सांस्कृतिक क्षेत्र में चलने वाले कार्य कलाप, लेखक के आपसी रिश्ते, उन्हें परेशान करनेवाले तरह तरह के मसले, उनके जीवन यापन की स्थिति, उनके आपसी झगड़े और मन मुटाव आदि आदि हमारी सांस्कृतिक गतिविधि से पर्दा उठाते है और हम लेखक को हाड़ मांस के पुतले के रूप में देख पाते हैं. लेखक अपनी इन कमजोरियों के रहते अपनी लीक पर चलता हुआ सृजन के क्षेत्र में कहीं सफल और कहीं असफल होता हुआ अपनी इस यात्रा को कैसे निभा पाता है, इसे हम उसके जीवन के परिप्रेक्ष्य में देख पाते हैं"
फैसला: जरूर जरूर जरूर पढ़िये.
किताब का नाम: "भीष्म साहनी : मेरे साक्षात्कार"
प्रकाशक: किताब घर 24 अंसारी रोड नई दिल्ली
वर्ष 1995
मूल्य रु.150.
आईएसबीएन: 81-7016-320-X
Tuesday, 15 April, 2008
भीष्म साहनी की "मेरे साक्षात्कार"
अरे, ओ तोप के पोपचिओ, सुनते हो, कान के बहरिओ?..
इस ब्लॉग के अपने आखिरी पोस्ट पर आयी एक प्रतिक्रिया के जवाब में भैया चंद्रभूषण ने ज़रा झल्लायी आवाज़ में हिंदी किताबी कोने की दिनों-दिन बेहाल होते हाल की शिकायत दर्ज़ करवायी थी.. और ग़लत नहीं करवायी थी.. इन गुज़रे चंद महीनों में अपने किताबी कोने की स्थिति कमोबेश वैसी ही हो चली है जैसे छोटे शहरों में (या कहें, अब तो हर जगह?) हिंदी किताबों की दुकान पर उपलब्ध साहित्यिक दोने में जैसे सुख कम, टोटके और टोने ज़्यादा मिलते हैं.. तो कुछ उसी अंदाज़ में बीच-बीच में हम कुछ टोने-टोटकों से किताबी कोने को जियाये हुए हैं.. इस तरह किताबी कोना जीता रहेगा, मगर कुछ उसी तरह जीता रहेगा जैसे बहुत सारे राष्ट्रीयीकृत बैंकों की सालाना हिंदी पत्रिकाएं जीती रहती होंगी?..
लेकिन अपने हिंदी किताबी कोने की इस कछुआ चाल की आखिर दिक़्क़त क्या है? दस जो यहां घोषित तोपची दिख रहे हैं, और सब किताबों को लेकर उत्साहित रहनेवाले जीव हैं, हुआ क्या है सबने किताबें पढ़नी बंद कर दी हैं? या ऐसा गुप्त साहित्य पढ़ रहे हैं कि उसकी इस ब्लॉग पर चर्चा से उनके पसीने छूटने के ख़तरे होंगे? या कि दिक़्क़त सचमुच यह है कि बेर-अबेर जब कभी पढ़ना हो ले, ज़रूरी नहीं कि पाठ्य-सामग्री हिंदी की होती हो? भई, ऐसी मुश्किल में माफ़ कीजिएगा मैं खुद के अनुभवों से सामान्यीकरण करने को मजबूर हो रहा हूं, सो कर रहा हूं- कि अपना पढ़ना तो होता रहता है मगर ज़रूरी नहीं कि हिंदी में होता हो. कुछेक महीनों से जो बारह-पंद्रह किताबों की संगत चल रही है उसमें हिंदी की सिर्फ़ एक किताब है, अमृतलाल नागर का उपन्यास- खंजन नयन, और उसका वाचन भी अटक-अटक कर ही चल रहा है..
तो भइय्या, हिंदी किताबों के लाड़ले प्यारे तोपचियो.. व ढिंढोरचियो.. सच्चायी और समस्या यह है कि आप, हमारी तरह, हिंदी में ख़ास कुछ पढ़ ही नहीं रहे हैं? भइय्या लोगो, समस्या अगर यह है तो सीधे-सीधे कहते, ब्लॉग के नाम से हम ‘हिंदी’ कबार कर उसे महज़ ‘किताबी कोना’ बनाये दिये होते? क्योंकि दिलअज़ीज़ दोस्तो, जीवन में क्रियात्मक नहीं तो कुछ ज्ञानात्मक गतिविधि चलती तो रहे? अब जैसे क्रिस हरमन के लिखे इसी इतिहास की किताब को लीजिए, भारी किताब पौने चार सौ की दिखी तो कम से कम एक चौथाई अपने काम की होगी सोचकर जिज्ञासावश मैंने उठा लिया, घर लौटकर उलटना-पुलटना शुरू किया तो एकदम से प्रसन्न हुआ कि यह तो मज़ेदार चीज़ निकली, भई! कोई अनुवादक प्रेमिका होती तो उसे चट् से कहता इसे हिंदी में तैयार करने के लिए जुट जा, कि कुछ ज्ञानात्मक देहातियों का भला हो? ख़ैर, वह बाद की बात है, फ़िलहाल अभी आपको सूचित तो कर ही रहा हूं, दिल्ली या जहां कहीं ऑरियेंट लॉंगमैन की किताबें लहा सकते हैं, बाबू क्रिस हरमन की ‘अ पीपुल्स हिस्टरी ऑव द वर्ल्ड’ का पता कीजिए और पौने चार सौ खर्च करके न केवल घर ले आइए, बल्कि जल्दी पढ़कर निपटा भी डालिये! मज़ेदार है, आपने उत्साह दिखाया तो जल्दी उसके एक-दो हिस्सों से क्वोट भी यहां चढ़ाता हूं..
बाकी एक दूसरे काम की, मेरे, चीज़ यह है कि एक फ्रांसीसी, ज़रा अनकन्वेंशनल, इतिहासकार नज़र पर चढ़े हैं, मगर उनकी किताबें हाथ नहीं चढ़ रही.. किसी तरह आपके हाथ चढ़ सकती हो तो कृपया मुझ गरीब को सूचित करें..
और इस ‘हिंदी’ और ‘किताबी’ और ‘कोने’ का ठीक-ठीक क्या करना है ज़रा ठीक-ठीक बतायें.. कहां हो, भइय्या यूनुस मियां.. और पीरहरंकर भैयाजी?.. ऐसे जनता की लाइफ़बेरी चलाइएगा आप लोग? कुछ शरम-टरम है कि नहीं? कि अप्रैल की गरमी में उसको भी रूह-अफज़ा के शरबत में धोकर पी गए हैं?..
Wednesday, 9 April, 2008
कौन देस से 'देशनिकाला'
फिल्मी दुनिया के इर्दगिर्द बुनी गई रचनाएं हिंदी में ज्यादा नहीं हैं और जो हैं वे सहज नहीं हैं। सुरेंद्र वर्मा की 'मुझे चांद चाहिए' हिंदी में अबतक सुपरहिट गए कुछ चुनिंदा उपन्यासों में गिनी जाती है। इसे शास्त्रीयता और सड़क के बीच का एक पुल भी बताया गया, लेकिन दस साल बाद यदि इसका पुनर्पाठ करें तो आश्वस्ति भाव कम हो जाता है। बहुत सारे स्टीरियोटाइप्स को लेसने वाली मठारी हुई भाषा, जो श्रीलाल शुक्ल की 'राग दरबारी' और मनोहर श्याम जोशी की 'कुरु-कुरु स्वाहा' के बाद खुद को शेष कर चुकी है। आप पढ़ते हैं और पाते हैं कि उपन्यास में दूसरी बार खोजने के लिए कुछ भी नहीं है। छिटपुट कुछ और उदाहरण लिए जा सकते हैं लेकिन हिंदी मनोजगत में सिनेमा का जितना बड़ा दखल है, उस हिसाब से साहित्य में कैंड़े का कुछ भी मौजूद नहीं है।
धीरेंद्र अस्थाना के 'नया ज्ञानोदय' में प्रकाशित हालिया उपन्यास 'देशनिकाला' से यह कमी पूरी होती है, सो बात नहीं है। कायदे से संबोधित भी होती है या नहीं, यह बात भी पूरे भरोसे के साथ नहीं कही जा सकती। लेकिन एक 'लार्जर दैन लाइफ' दुनिया को उसके औसत कद में आम इन्सानी नजर से देख पाने की संभावना इस उपन्यास में जरूर मौजूद है। फिल्मी दुनिया इस किताब में महज एक पृष्ठभूमि की तरह मौजूद है, ठीक वैसे ही जैसे मुंबई शहर की जीवंतता। लेकिन पैसे और महत्वाकांक्षा का एक महाभंवर जब आपको खींच रहा होता है, तब भी दुनिया की और किसी भी जगह की तरह आप अपना स्वतंत्र अस्तित्व कैसे बनाए रख सकते हैं, इस नोडल प्वाइंट की खोजबीन इसे फिल्मी दुनिया के शरीर के बजाय इसकी आत्मा के ज्यादा करीब ला देती है।
अगर कोई इस उपन्यास में हकीकत खोजने चले तो उसे हताशा हाथ लगेगी। शोभा डे अपने उपन्यासों में जिस दुनिया को पछीट-पछीट कर धोती हुई अपने पूरे रचनाकर्म को ही कमोबेश एक धोबीघाट बना देती हैं, वह दुनिया इसमें कहीं नजर नहीं आती। उसका टुच्चापन, उसकी गलाजत, उसके महिमामंडित मनोरोग इस उपन्यास की विषयवस्तु को कहीं से छूते तक नहीं। इन सारी चीजों की उपस्थिति इसमें सिर्फ इतनी है कि ये शहर को तीन तरफ से घेरे समुद्र की तरह बिना नजर आए दूर ही दूर से अहर्निश हरहराती रहती हैं। न इनकी कहीं निंदा होती है, न स्तुति की जाती है। ये यहां वैसे ही हैं, जैसे दिल्ली में नेताओं की नेतागिरी और दलालों की दलाली- हवा की तरह ज्यादा तंग किए बगैर चौगिर्द बहती हुई।
कहानी कभी रंगमंच से जुड़े चालीस के लपेटे में चल रहे एक युगल की है, जो कुछ दिन लिव-इन में साथ रहने के बाद फिलहाल अलग-अलग रह रहे हैं। नायिका स्टेज के बरक्स फिल्मी दुनिया को अग्राह्य नहीं मानती, हालांकि वहां कुछ शुरुआती टपले खा लेने के बाद एक अर्से से वह ट्यूशन पढ़ाने में मुब्तिला है। जबकि नायक अपने आदर्शवाद में कुछ दिन और रंगमंच के लपेटे में रहकर फिलहाल फिल्मों की स्क्रिप्ट राइटिंग में हाथ आजमा रहा है। बीच-बीच में दोनों का मिलना-जुलना भी हो जाता है, लेकिन रिश्तों में गर्मी नहीं पैदा होती। संयोग से एक बार नायक की एक कोई चीज फिल्मी दुनिया के एक नए फार्मूले में अंट जाती है और जिंदगी की राह रवां हो जाती है।
नायक के हाथ में दो पैसे आते हैं तो उसे वारिस की चिंता सताती है। नायिका को फोन करता है तो उसे शुरू में यह बेतुकी सी बात लगती है। लेकिन संयोग ऐसा कि उसी समय किसी और नए फार्मूले में उसके अभिनय के लिए भी जगह निकल आती है। सारा किस्सा किसी परीलोक जैसा है। इधर फिल्म मिलती है उधर इसी खुशी में वह मां बनने की राह पर निकल पड़ती है। करीअर या बच्चा जैसे घनघोर दुविधा वाले कुछ क्षण भी आते हैं लेकिन यह टकराव जानलेवा नहीं बनता। फिल्मी दुनिया में अब बाल-बच्चेदार हीरोइनों के लिए भी गुंजाइश बनने लगी है। अपनी दूसरी फिल्म में ही, जब वह प्रसिद्धि और उत्कृष्टता के चरम पर होती है, तो उसे छोड़कर वह अपने ट्यूशनों और अपनी बेटी की दुनिया में ही मगन रहने का फैसला लेती है।
एक समय का आदर्शवादी नायक अब फिल्मी दुनिया की अंतरंग महफिलों और राजनीति का हिस्सा बन चुका है। नायिका का फैसला उसे अहमकाना लगता है। साथ रहने की संभावना एक बार फिर समाप्त हो जाती है और मां-बेटी अपने 'देशनिकाले' की लय तलाशती रह जाती हैं। (किसका देश और काहे का देशनिकाला? जब फिल्मी करीअर के चरमोत्कर्ष पर उसे छोड़ देने जैसा बड़ा फैसला नायिका द्वारा लिया जा चुका है और अपनी मर्जी का एक 'देस' उसने पहले से ही रच रखा है तो खामखा रोने-बिसूरने के लिए इसे देशनिकाले का नाम देना जबर्दस्ती की नारीवादी ज्यादती नहीं तो और क्या है?)
एकबारगी लगता है कि इस उपन्यास में यथार्थ के बरक्स फैंटेसी कुछ ज्यादा ही हावी हो गई है। कहीं यह मुंबई फिल्म उद्योग की बेरहम दुनिया का महिमामंडन तो नहीं? लेकिन इन्सानी फैसलों को अगर इन्सानी दुनिया से जुड़ी किसी भी कहानी का मूल तत्व समझा जाए तो इस उपन्यास के कुछ बड़े मायने भी बनते हैं। सकारात्मक बातें इससे ज्यादा नहीं की जा सकतीं। क्लासिकी, बल्कि श्रेष्ठतर रचनाओं की खासियत मानवीय निर्णय और मानवीय नियति के जिस टकराव में खोजी जाती है, उसे निबाहने का धैर्य इस रचना में (सिरे से न भी सही तो) लगभग नदारद है।
निजी बातचीत में लेखक इस अधैर्य के लिए कुछ लेखकीय उलटबांसियों और कुछ प्रकाशकीय दबावों को जिम्मेदार ठहराते हैं। यह उपन्यास दरअसल राजेंद्र यादव और धीरेंद्र अस्थाना के साझा प्रयास के रूप में लिखा जाना था। अपने हिस्से के दस-बारह पन्ने लिखकर राजेंद्र जी ने दिल्ली से धीरेंद्र जी के पास मुंबई भेजे भी लेकिन वहां जिस मुकाम से रचना आगे बढ़ी उसका कोई तरल संबंध शुरुआती हिस्से के साथ नहीं बन पाया (वैसे भी 'तरल' संबंध रचनाकारों में संध्याकालीन सभाओं के दौरान जितनी आसानी से बन जाते हैं उतनी आसानी से रचनाओं के बीच कहां बन पाते हैं)।
फिर हारकर धीरेंद्र जी को शुरुआती हिस्सा भी नए सिरे से लिखना पड़ा। इधर 'नया ज्ञानोदय' के संपादक रवींद्र कालिया उपन्यास छपने की तिथि घोषित कर चुके थे, लिहाजा जो 'फाइनल ड्राफ्ट' तबतक बन पाया था वह पत्रिका के पैंतालीस पृष्ठों में छप गया। रचना इस रूप में भी दिलचस्प है। भाषा में पत्रकारिता की रवानी है (मुंबई की महाबरसात की महा-रिपोर्टिंग इस प्रस्थापना की पुष्टि कुछ ज्यादा ही शिद्दत से करती है) और अंतिम एक-दो पैराग्राफों को छोड़कर फिल्मी या साहित्यिक स्टीरियोटाइप भी कहीं नजर नहीं आते। लेकिन जबतक किताब के रूप में नहीं छपती तबतक इसे घर की लड़की घर में ही रहने जैसी बात समझा जाना चाहिए। पुस्तकीय रूप में आने तक अंतिम टुकड़े पर कुछ और काम कर लेने में मुझे कोई बुराई नहीं नजर आती।
Thursday, 13 March, 2008
एक पन्ने का मज़ा लीजिये ... सुनिये....
किताब का नाम : निकीता का बचपन
लेखक : अलेक्सई तोलस्तॉय
अनुवादक : मदन लाल 'मधु'
चित्रकार : व. कानाशेविच
प्रकाशक : प्रगति प्रकाशन , मॉस्को
किशोर साहित्य पुस्तकमाला
यह किताब लेखक ने अपने बेटे निकीता अलेक्सेयेविच तोलस्तॉय को सस्नेह समर्पित किया है और अंतिम पन्ने पर प्रकाशक का एक संदेश है
पाठकों से
प्रगति प्रकाशन इस पुस्तक की विषय वस्तु , अनुवाद और डिज़ाईन संबंधी आपके विचारों के लिये आपका अनुगृहित होगा।
आपके अन्य सुझाव प्राप्त करके भी हमें बड़ी प्रसन्नता होगी। हमारा पता है
21 ज़ूबोव्स्की बुलवार
मास्को , सोवियत संघ
(अब ये पता , पता नहीं है भी कहीं )
खैर , इसके कुछ अंश का मज़ा लीजिये .... .
और ये भी .....
Friday, 25 January, 2008
नए चीन में दस दिन
गहरे पैठने वाले हिंदी कवि-समालोचक गिरधर राठी की लिखी यह किताब करीब दस साल पहले मेरे हाथ लगी थी। किताब दिलचस्प थी लेकिन पता नहीं क्यों तब पूरी पढ़ नहीं पाया था। इधर ओलंपिक और प्रधानमंत्री की यात्रा की वजह से चीन चर्चा में आया तो पढ़ना शुरू किया, और अब हालत यह है कि रात में किताब छोड़कर सोने जाने में तकलीफ होती है। यह किताब 1993 में प्रख्यात कन्नड़ लेखक और समाजवादी चिंतक यूआर अनंतमूर्ति के नेतृत्व में दस दिन के लिए चीन गए भारतीय लेखकों के एक प्रतिनिधिमंडल के प्रेक्षणों का नतीजा है।
खुद गिरधर राठी की ख्याति उनकी खुली नजर और लोकतंत्र के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के लिए की जाती है। वाम भविष्य में उनकी रुचि जरूर है लेकिन आपातकाल में जेल काट चुके राठी जी कम्युनिस्ट ढांचे के व्यक्ति नहीं हैं। इससे लगाव और विलगाव का वह संतुलन इस किताब में साफ नजर आता है, जो चीन जैसे दूर हो चले नजदीकी देश के गहरे प्रेक्षण के लिए जरूरी है। एक कविसुलभ सहज मानवीय दृष्टि इस किताब में हमें पंद्रह साल पहले के चीन के ऐसे कई पहलू दिखाती है, जो गहरी समझ वाले अकादमिक मिजाज के नामी अंग्रेजी लेखकों की पकड़ में नहीं आ पाते।
मसलन, उस समय साइकिलों की बहुलता वाले चीनी शहरों में तेजी से अपनी पैठ बना रही कारों के डगमग से शक्ति-संतुलन के बारे में। राठी को वहां राजधानी में एक लाल बत्ती पर कार वाले का गिरेबान थामे साइकिल वाला और उनके बीच तत्तो-थंभो करा रहे ट्रैफिक पुलिस वाले दिखे। इसके दो-तीन दिन बाद पेइचिंग में ही उन्होंने कारों के लिए रिजर्व कर दी गई एक सड़क पर एक साइकिल वाले को पुलिस की डांट खाते हुए भी देखा।
1993 में चीन में सन् 2000 का ओलंपिक पेइचिंग में आयोजित कराने का अभियान चल रहा था जो अंततः कामयाब नहीं हुआ। चीन को ओलंपिक कराने का मौका जरूर मिला लेकिन 2008 का। एक तरह से यह अभियान 1992 से 2008 तक की निरंतरता में बना रह गया। किस मायने में यह अभियान दिल्ली में चल रहे बिल्डर-प्रायोजित कॉमनवेल्थ-2010 खेलों के आयोजन से मिलता-जुलता है और किस मायने में उससे अलग है, इसका एक अंदाजा भी राठी की किताब पढ़ने से लगता है।
किताब का सबसे गहरा पहलू है चीन में कविता, कला-संस्कृति की स्थिति के बारे में की गई पड़ताल, जिसके जरिए बाकायदा एक तरह का चीन-मंथन सामने आता है। जनपक्षी लोकतंत्र के पक्षधर कवि के लिए यह बाह्य प्रेक्षण से ज्यादा एक आंतरिक प्रश्न-प्रतिप्रश्न जैसा है। इस दौरान सर्वहारा तानाशाही की बर्बरताओं की ही नहीं, भारत जैसे पूंजीवादी लोकतंत्र की अंतरात्मा में मौजूद संस्कृतिकर्म की आपराधिक उपेक्षा की छानबीन भी चलती रहती है। भारत की तरह ही चीन भी विराट ऐतिहासिक स्मृतियों और उनसे अर्जित विवेक वाला समाज है। 'बुद्धिमान अपनी गलतियों से सीखता है, अधिक बुद्धिमान दूसरों की गलतियों से' जैसी सूक्तियां वहां पग-पग पर बिखरी पड़ी हैं।
छपने के बाद से ही उपेक्षा की शिकार 'नए चीन में दस दिन' हिंदी के पाठकों के लिए पेइचिंग ओलंपिक के इस साल में चीन को ज्यादा नजदीकी से समझने का जरिया बन सकती है। दिल्ली के किताबघर प्रकाशन से छपी यह किताब अभी बाजार में उपलब्ध है या नहीं, इसका पता करना पड़ेगा।
Wednesday, 26 December, 2007
Tuesday, 25 December, 2007
फ़िल्मी सितारे
भाई अफज़ल ने आरएमआईएम पर कुछ दिन पहले एक ऐसी किताब का परिचय रखा था जिससे पता चलता है कि 1940 तक फिल्मों में काम करने वाली हीरोइनें कैसी थीं. किताब 1946 में हैदराबाद से छपी थी. उन्होंने उर्दू में लिखी इस किताब की भाषा बहुत अरबी-फारसीनिष्ठ बताई है और उसके कुछ हिस्से अपने अंदाज़ में अंग्रेज़ी में पेश किये हैं. मुझे यह किताब दिलचस्प लगी थी और सवाल आया था कि हिंदी में ऐसी किताब क्यों नहीं बनाई गयी.
परसों मेरे एक श्रोता ने मुझे ऐसी ही एक किताब दिखाकर मुझे चकित किया जो हालाँकि मूल अंग्रेज़ी किताब का हिंदी अनुवाद है.
किताब 116 पृष्ठों की है. इसका आकार है- 7.5" X 9.5" है. किताब के पन्ने अब टूट रहे हैं और इस हालत में इसका सहेजा जाना एक ख़ास श्रद्धा की गवाही देता है.
अंदर के पृष्ठ पर ऊपर लिखा है- फिल्मी सितारे और उसके नीचे लिखा है- भारत के प्रसिद्ध फिल्मी सितारों का चरित्र. लेखक हैं- हरीश एल. बुच और केरींग डोयल. अनुवादक- हरिशंकर और रवींद्रनाथ चतुर्वेदी हैं. 1957 में छपी यह किताब तब दो रुपये पचास नये पैसे में ख़रीदी जा सकती थी. प्रकाशक का नाम था- लाखानी बुक डीपो, गिरगाँव, बम्बई-4
इसमें प्रस्तावना लिखी है एस के पाटील ने, जो कि भारतीय चलचित्र उत्पादक सभापति बताए गये हैं. भूमिका लेखकों ने ही लिखी है.विषय सूची से ठीक पहले तीन विज्ञापन छपे हैं. पहला है- रामतीर्थ ब्राह्मी तेल,लंबे और सुंदर बालों के लिये उपयोग कीजिये, इसे बनाते है श्री रामतीर्थ योगाश्रम, दादर बंबई. दूसरा है- फ़्लोरोज़ोन काले चर्म को सफ़ेद बनाता है और तीसरा है- मर्सीडीज़ और प्लेमैन फ़ाउंटेन पेन, जिसे फ़्रांस ट्रेडिंग कॊरपोरेशन, माहीम बम्बई, बेचते हैं.
किताब में तेइस फ़िल्मी सितारों के परिचयात्मक रेखाचित्र हैं और कोई पैंसठ दुर्लभ फ़ोटोग्राफ़्स हैं.
ये तेइस सितारे हैं- अशोक कुमार, उषा किरण, कामिनी कौशल, गीता बाली, जयराज, डेविड, दिलीप कुमार, दुर्गा खोटे, देव आनंद, नरगिस, नलिनी जयवंत, निम्मी, निरुपा राय, नूतन, बलराज साहनी, मधुबाला, बीना राय, मनहर देसाई, मीना कुमारी, मोतीलाल, राजकपूर, वैजयंती माला और सुरैया.
कवर का नमूना (कवर डिज़ाइन किया है)-एस जी परेलकर ने और फ़ोटोग्राफ़्स हैं- राज दत्त आर्ट्स, शांगीला, आर.जी.शाह इंडिया फ़ोटो, बी.जे.पांचाल, पूनम प्रेस फ़ोटो और देवरे एंड कंपनी के.
मैं यहां इस किताब से एक अंश प्रस्तुत करता हूं-
"...बम्बई के विलसन कॉलेज और ख़ालसा कॉलेज में विज्ञान पढने के बाद उन्होंने अपनी रोज़ी स्वयं पैदा करने का विचार किया. उन्होंने सोचा कि केवल परिवार का ही व्यवसाय नहीं अपनाना चाहिये, वरन किसी नये व्यापार पर हाथ आज़माना चाहिये.
बम्बई छोडकर नये व्यवसाय की खोज में वे पूना चले गये और ब्रिटिश फौज में कैंटीन मैनेजर का काम सँभाला. लडाई के दिन थे और सिपाहियों के साथ ने ख़तरनाक जीवन अपनाने की उनकी भावना को कुछ राहत दी. पर शुरू में उन्हें 35 रुपये महीने दिये गये. पर वह उसी से चिपके रहे और शीघ्र ही फौजी मेस में एक उपहार-गृह चलाने का ठेका मिल गया. उसमें व्यापार बडा अच्छा था, यहाँ तक कि तीसरे महीने में उन्होंने 800 रुपये पैदा कर डाले. यह ठेका एक साल चला, क्योंकि फौजी राशन स्कीम चालू होने पर वह समाप्त कर दिया गया. काफी रकम जमा करने के बाद वह बंबई में फिर वापस आ गये.
उन दिनों बम्बई टॉकीज़ के कार्यकर्ता नये अभिनेताओं की तलाश में थे और उनकी प्रधान- देविका रानी ने दोनों ने ही नैनीताल में एक मित्र के द्वारा सुंदर, सुडौल, यूसुफ का परिचय प्राप्त कर लिया था. वह उनसे इतनी प्रभावित हुई कि आवश्यक परीक्षा के बिना ही उन्हें नियुक्त कर लिया और बॉम्बे टॉकीज़ की 'ज्वारभाटा' में नयी हीरोइन मृदुला के साथ अभिनय का अवसर दिया. झिझक के साथ इस प्रस्ताव से वह सहमत हो गये, क्योंकि फिल्मी वृत्ति अपनाने की उनकी कोई इच्छा नहीं थी.
चित्रपट के लिये उनका नाम रखने का प्रश्न भी बॉम्बे टॉक़ीज़ के सामने अब उपस्थित हुआ और 'जहाँगीर', 'वासुदेव' और 'दिलीप कुमार' तीन नाम प्रस्तावित हुए. देविका रानी ने तीसरा नाम पसंद किया, यद्यपि यूसुफ खान दूसरे दोनों नामों में से एक चाहते थे..."
पुस्तक के अध्याय दिलीप कुमार से, पृष्ठ संख्या 38-39
यहीं पर एक फोटो है जिसमें दिलीप कुमार सेट पर ब्रेक के बीच गोल दामन की कमीज़ और पैजामा पहने हुए बल्लेबाज़ी कर रहे हैं और मुकरी विकेटकीपरी कर रहे हैं.
Friday, 14 December, 2007
बॉबी बोरिस के साथ जहान की सैर
बचपन में बच्चों वाली पढ़ी किताबें याद करने बैठें तो हिन्दी में बेहद उम्दा रूसी किताबों का अनुवाद याद आता है , मिश्का का दलिया , निकिता का बचपन और बॉबी बोरिस और रॉकेट । पहली दो किताबों के लेखक शायद श्री अ नोसोव हैं ( अ माने क्या ? अलेक्सान्द्र ? पर जहाँ तक याद है नाम में सिर्फ अ ही था , खैर ) बॉबी बोरिस के तो लेखक तक का नाम याद नहीं , प्रकाशक और अनुवादक तो खैर नहीं ही , अब इसका इतना अफसोस , क्या कहें । पर भरपाई में कहानी लगभग पूरी याद है , कवर आँखों के सामने है , अंदर की शानदार छपाई और इलसट्रेशंज़ के तो क्या कहने । क्रीम कलर के चमकते कागज़ पर मन मोहने वाले पेंसिल स्केचेज़ ।
मिश्का और निकिता के क्रीम कैनवस का कवर और सीधे बड़े अक्षरों में , बिना लाग लपेट के लिखा नाम ,बॉबी बोरिस में पीपेनुमा रॉकेट से भौंचक आँखों ताकता झबरीला कुत्ता नीले आसमान में उड़ान भरता । बॉबी कुत्ते की आवारा भौंचक आँखें , रुसता फूलता हमारा अंवेशणकर्ता गेना और धीर गंभीर पर नटखट शरारती बोरिस और उनको दिनरात तंग करती जासूस लीदिया (या लुदमिला , ठीक याद नहीं ) ।. माँ को इमोशनल ब्लैकमेल करके दर्जन भर अंडे अपने किसी अनुसंधान के लिये माँगते गेना की दरवाज़े पर पेट के बल लटकने का रेखाचित्र अभी अभी आँखों के आगे कितना साफ लहरा गया । पिछले दो पन्नों पर उन कुत्तों की तस्वीर जो अंतरिक्ष में गये, लाईका , ओत्वाज़नाया और अन्य नाम जो अब याद नहीं ।
बॉबी बोरिस और रॉकेट , ये किताब दो दोस्तों की कहानी थी, बोरिस और गेना और बोरिस के कुत्ते बॉबी की। बोरिस और गेना दिनरात अनुसंधान में लगे रहते। एक पीपे को रॉकेट बनाकर और अपने प्यारे कुत्ते बॉबी को अंतरिक्ष यात्री बनाकर वे कोशिश करते हैं उसे अंतरिक्ष में भेजने की। प्रयास असफल रहता है और इसी क्रम में वे बॉबी को खो देते हैं। बहुत तलाशने के बावज़ूद वे उसे खोज नहीं पाते। इसी बीच घायल बॉबी को एक आवारा जानवरों के आश्रय में घर मिल जाता है। अंतरिक्ष में कुत्तों को भेजने का सरकारी अनुसंधान चल रहा है और कई ऊँची नस्ल के कुत्तों को आजमाने के बाद ये निष्कर्श निकलता है कि अंतरिक्ष यात्रा के लिये जिस तरह के धैर्य की जरूरत है वो सिर्फ आवारा कुत्तों में ही पाया जाता है। उसके बाद बॉबी की यात्रा "दिलेर" बनने की शुरु होती है। अंतरिक्ष से सफलता पूर्वक वापस आने पर टीवी पर बोरिस और गेना उसे पहचान लेते हैं और उनका सुखद मिलन होता है.।
किताब इतनी रोचक थी कि हम उसे कई बार पढ गये थे. शैली मज़ेदार थी और कहानी में बच्चों और कुत्तों की मानसिकता का इतना प्यारा वर्णन था कि कई बार बडी तीव्र इच्छा होती कि काश उन बच्चों सी हमारी जिंदगी होती। हमारा ज्ञान अंतरिक्ष के बारे में भी खासा बढ गया था और यूरी गगारिन, वैलेंतीना तेरेश्कोवा जैसे नाम हमारी ज़बान पर चढ गये थे । ये किताब शायद उस दौर में लिखी गई थी जब सोवियत संघ और अमरीका में दौड़ चल रही थी , अंतरिक्ष में पहली घुसपैठ किसकी हो , स्पूतनिक और अपोलो , चाँद और पहली अंतरिक्ष यात्रा ? वोस्तोक और सोयूज़ , जेमिनी और अपोलो ।
पठनीयता और प्रवाह के साथ अस्ट्रोनोमी और विज्ञान का ऐसा अद्भुत संसार इस किताब ने खोला कि हम हैरान । साईंस फिक्शन पढने का चस्का इसी किताब की देन है ।
(किताबी कोना पर इसे डालने का एक फायदा , क्या पता किसी ने इसे पढ़ी हो , उन्हें कुछ और डिटेल्स याद हों , इस किताब को फिर लोकेट किया जा सके । ऐसे ही आगे मिश्का का दलिया और निकिता का बचपन के बारे में भी लिखूँगी । फिर बाकी किताबें .. )
पुन : किताबी कोना हिन्दी किताबों का कोना है । बॉबी बोरिस और रॉकेट चूँकि हिन्दी में अनुदित है इसलिये मोहवश खींच खाँचकर इसे यहाँ डाल देने का पाप कर रही हूँ । क्षमाप्रार्थी हूँ ।
Thursday, 6 December, 2007
लंबी दाढ़ी
व्यंग्यकारों की परंपरा हिंदी में लंबी है, भले ही उसमें क्वालिटी के लोग तुलनात्मक रूप से कम हों। लेकिन बिना विकृतियों का बाजार लगाए लोगों को सहज रूप से अपने लेखन से हंसने को मजबूर कर देने वाले हास्यकार तो यहां शायद उंगलियों पर गिने जाने लायक ही हों। जीपी श्रीवास्तव की जगह इस मामले में मेरी नजर में बहुत ऊंची है, हालांकि हिंदी की नई पीढ़ी में ज्यादातर लोगों को शायद उनका नाम भी नहीं पता होगा। काफी लंबे अंतराल पर उनके दो उपन्यास (एक दस-बारह साल की उम्र में और दूसरा उन्तीस-तीस की) मेरे हाथ लगे थे।
बाद वाले का नाम नहीं पता। सिर्फ विश्व भाषा सम्मेलन (जो इस उपन्यास की पृष्ठभूमि है) में गए भारत के दो साहित्यकारों- गिचपिचनाथ भोंपू और श्री च्यमगादुड़म के नाम मुझे याद हैं। पहली किताब, जिसका एक-एक पैरा पढ़कर हम लोग हंसते-हंसते लोटपोट हो जाते थे, जीपी श्रीवास्तव की 'लंबी दाढ़ी' है। यह एक हॉस्टल में पढ़ रहे कुछ शरारती किशोरों की कथा है, जिन्होंने अपने वार्डन, स्टाफ और अध्यापकों की नाक में दम कर रखा था, और हर शरारत इतने सलीके से करते थे कि किसी में भी उन्हें फंसा पाना नामुमकिन रहता था। किताब की शुरुआत में किन्हीं गुणग्राहक के लिखे एक शेर की एक पंक्ति भी याद है- अच्छी बातें भी बताती है, हंसाती भी है, बड़ी मासूम बड़ी नेक है लंबी दाढ़ी।
हाल में भोजपुरी की अग्रणी पत्रिका 'भोजपुरी साहित्य' में जीपी श्रीवास्तव का लिखा एक भोजपुरी नाटक पढ़ते हुए मन में हुआ कि बचपन के अपने इस सबसे प्रिय साहित्यकार के बारे में कुछ दरियाफ्त किया जाए। मैंने इसके संपादक प्रो. अरुणेश 'नीरन' जी से बात की, जो मेरे एक दोस्त के पिता होने के अलावा एक प्रतिष्ठित साहित्य समालोचक भी हैं। उन्होंने जीपी श्रीवास्तव के बारे में कई मजेदार बातें बताईं। लेकिन इस उपन्यास के प्रकाशक और इसकी प्रकाशन तिथि जैसी कुछ जरूरी जानकारियां उनसे हासिल करना मुझसे उस वक्त नहीं हो पाया। नीरन जी देवरिया में रहते हैं और जल्द से जल्द इस बारे में जानकारी जुटाकर मैं यहां देने का प्रयास करूंगा। तबतक किसी और मित्र को पता चल जाए तो उसे यहां डाल दें।
गांधीजी की संक्षिप्त आत्मकथा
चोरी
इन दो अनुभवों से पहले अपने एक रिश्तेदार के साथ मुझे बीडी पीने का शौक़ हो गया था. मेरे काका को बीडी पीने की आदत थी. अतएव उन्हें और दूसरों को धुआँ निकालते देखकर हमें भी बीडी फूँकने की इच्छा हो आई. गाँठ में पैसे थे नहीं, इसलिये काका बीडी के जो ठूँठ फेंक दिया करते थे, हमने उन्हें चुराना शुरू किया.
लेकिन ठूँठ भी हर समय मिल नहीं सकते थे. इसलिये नौकर की गाँठ से जो दो-चार पैसे होते, उनमें से बीच-बीच में एकाध चुरा लेने की आदत डाली, और हम बीडी ख़रीदने लगे. किंतु हमें संतोष न हुआ. अपनी पराधीनता हमें खलने लगी. इस बात का दुख रहने लगा कि बडों की आज्ञा के बिना कुछ हो ही नही सकता. हम उकता उठे और हमने आत्महत्या करने का निश्चय किया.
हम दोनो जगल मे गये और धतूरे के बीज ढूंढ लाये. शाम का समय खोजा. केदारजी के मदिर की दीपमालिका मे घी चढाया, दर्शन किये और एकांत ढूंढा. लेकिन ज़हर खाने की हिम्मत न पडी. अगर फ़ौरन ही मौत न आई तो? मरने से लाभ ही क्या? पराधीनता को ही क्यों न सहन किया जाय? फिर भी दो-चार बीज खाए. और अधिक खाने की हिम्मत ही न हुई. दोनों मौत से डरे और तय किया कि रामजी के मंदिर में जाकर और दर्शन करके शांत हो जाना और आत्महत्या की बात को भूल जाना है.
(पृष्ठ 12, तब गाँधीजी की उम्र 12-13 साल थी और शुरू में जिन दो अनुभवों की बात उन्होंने की है उनमें मांसाहार और वेश्यावृत्ति है)
---------------------------------------
किताब का नाम: गांधीजी की संक्षिप्त आत्मकथा
संक्षेपकार: मथुरादास विक्रमजी
अनुवादक: काशिनाथ त्रिवेदी
प्रकाशक: नवजीवन प्रकाशन मंदिर, अहमदाबाद
मुद्रक: जीवणजी डाह्याभाई देसाई
नवजीवन मुद्रणालय, अहमदाबाद
सस्ती आवृत्ति अक्टूबर, 1952
मूल्य: बारह आना
कुल पृष्ठ: 260
आकार: पौने पांच इंच X सात इंच