Saturday 16 July 2016

The way of the world

पचास का शुरुआती दौर. चौबीस साल का निकोलस बुवीये, अपने कलाकार संगी के साथ टुटही गाड़ी और टूटे संसाधनों के साथ, हे हो, ले हो की पगलेटई में, जेनेवा से निकलकर खैबर पास तक पहुंचता है. ऐसी पगलेटई को हम प्रेम से लोपते हैं. लोपने को एक पीडीएफ का मारा हुआ फाइल पड़ा है, मगर हम हार्ड कापी की राह तक रहे हैं, इसलिए तक रहे हैं कि राहुल पांड़े आती अपनी नई तनख्‍वाह को ताक रहा है.

Suggested by Pramod Singh

Tuesday 15 November 2011

दबे पाँव



शेरजंग की शानदार किताब 'मैं घुमक्कड़ वनों कापढ़ने के बाद उनकी दूसरी किताबों को पढ़ने की भूख लिए-लिए जब मैं मित्र बोधि के घर पहुँचा तो मेरी नज़र उनके ख़ज़ाने के एक कोने में दबी और दूसरी किताबों के बोझ से कराह रही 'दबे पाँवपर पड़ी। ये ऐतिहासिक लेखक वृन्दावनलाल वर्मा के शिकार संस्मरणों को मुअज्जमा है। बोधि ने उदारता से किताब कवर चढ़ाकर मेरे हवाले कर दी और मैंने तो किताब पाई गाँठ गठियाई। 

किताब में वर्मा जी ने बुन्देलखण्ड के झांसीग्वालियरओर्छा आदि इलाक़ों के जंगलों में उनके शिकार के शग़ल की टीपें लिखी हैं। इन टीपों में स्यारखरहे-खरगोशमोरनीलकंठतीतरभटतीतरवनमुर्गीहरियलचण्डूल,लालमुनियाँसारसपनडुब्बियाँपतोखियांटिटहरीमगरऔर जलकुत्ता जैसे जीवों के बारे में तो बात होती ही चलती है। लेकिन मुख्य तौर पर इस किताब में जंगल के बड़े जानवर चिंकाराहिरनचीतलतेंदुआकाला तेंदुआचीतालकड़भग्गाखीसदार सुअररीछसाँभरनीलगायनाहर या बाघ या शेरसिंहजंगली कुत्ते(सुना कुत्तेऔर भेड़िये के व्यक्तित्वआपसी अन्तर और व्यवहार की तमाम अनमोल जानकारियां हैंजैसे भालू निरा बहरा होता है और नज़र का कमज़ोर होता है उसका एकमात्र सहारा उसकी नाक होती है। जब कभी किसी आदमी रूपी ख़तरे को अचानक वो अपने पास पा जाता है तो घबराकर उस पर हमला कर बैठता है। स्वभाव से वो बन्दरों की ही तरह मूलतः शाकाहारी है। या फिर लकड़भग्गा मौक़ा मिलने पर अपने ही भाई-बन्धुओं का भक्षण कर डालते हैं। हिंस्र पशुओं में तेंदुआ सबसे अधिक ढीठ होता है जबकि संसार का सबसे रफ़्तार वाला प्राणी चीता,बिल्ली की तरह पालतू बनाया जा सकता है। हालांकि चीता अब हमारे देश से लुप्त हो चुका है। इस तरह की जानकारियों के अलावा किताब में वर्मा जी के शिकार के दिलचस्प अनुभव हैं।

इस किताब को पढ़ने से जो तस्वीर ज़ेहन में खिंचती है उससे समझ आता है कि आज की तारीख़ में वन्यजीवन की हानि की इस भायनक त्रासदी के लिए ज़िम्मेदार दो बाते हैं

मनुष्य की बढ़ती आबादी के कारण कृषि भूमि का होने वाला लगातार विस्तार। जिसके चलते जंगल के जानवर और मनुष्य सीधे संघर्ष में फंस गए। किताब में बार-बार यह बात आती है कि चीतलचिंकारासुअर,हिरन जैसे जानवर किसानों खेत में घुसकर फ़सल का सम्पूर्ण विनाश कर देते हैं। जिसके चलते किसान या तो स्वयं मौक़ा मिलने पर इन जीवों की लाठी-डण्डों से पीट-पीटकर हत्या कर डालते हैं या फिर किसी बन्दूकधारी शिकारी के शिकार यज्ञ में भरपूर सहायता करके इन जानवरों के समूल नाश में अपनी योगदान करते हैं। और दूसरी वजह है.. 

बन्दूक के रूप में एक ऐसा भयानक आविष्कार जिसने आदमी और शेष प्राणियों के बीच के समीकरण को पूरी तरह से एकतरफ़ा बना दिया है। तीर की मार और गति से जानवर फिर भी मुक़ाबला कर सकता था पर गोली की मार और गति के आगे जंगल का हर पशु निरीह और बेबस है। परिणाम आप देख ही रहे हैंनंगे व सपाट मैदान जिसमें आदमी के सिवा दूसरा जानवर खोजना मुश्किल।

किताब का एक और दिलचस्प पहलू हैक्योंकि किताब ६४ साल पहले १९५७ में छपी और उसके भी काफ़ी पहले टुकड़ों-टुकड़ों में लिखी हुई हैइसलिए उसकी भाषा थोड़ी अलग है और उसमें कुछ ऐसे शब्द और प्रयोग मिलते हैं जो आजकल पूरी तरह से चलन से बाहर हो गए हैं। मसलन-
कलोल (किलोल)
परहा (पगहा?)
लगान (लगाम?)
टेहुनी (केहुनी)
परमा (प्रथमा तिथि)
ठिया
खीस (दांत)
ढी (ढीह)
/आगोट (आगे की ओट)
भरका (गड्ढा)
डाँग (पहाड़ का किनारा)
झोरझौंरझाड़ी)
बगर (पशु समूह)
ढुंकाई ढूँका (छिपकर घात लगाना)
ठपदार (ठप की आवाज़ करने वाला)
मुरकना (लचक कर मुड़ जाना)
ढबुआ (खेतों के ऊपर मचान का छप्पर)
दहनदी का सबसे गहरा बिन्दु)
टौरिया (छोटा टीला)
फुरेरू (शरीर को थरथरानाकंपकंपी लेना)

और कई शब्द ऐसे भी मिलते हैं जो शब्दकोषों में भी नहीं मिलतेइनके एक सूची मैं यहाँ दे रहा हूँ-:

तिफंसा/तिफंसी (घड़ा रखने की तिपाई)
झिद्दे (झटकेधक्के)
खुरखुन्द
छरेरी
गायरा (शेर आदि का किसी जानवर को मारकर बाद में खाने के लिए छोड़ कर चले जाना)
टोहटाप
छौंह (खरी छौहों वाला शेर)
रांझ (एक नाले में राँझ के नीचे)
झांस (झांस के नीचे छोटे नाले में)
टकारे (एड़ी से घुटने तक पहनने का जूता)
चुल (वहाँ तेंदुए की चुल थी)
बिरोरी (शिकार का एक प्रकारजब बेर फलते हों)


***

[किताब में एक और बड़ा दिलचस्प वाक़्या है जब वर्मा जी अपने साथियों के साथ जंगल में दाल-चावल की खिचड़ी बनाते हैं और जला बैठते हैं। जो आदिवासी इन शहरी शिकारियों की सहायता के लिए उनके साथ मौजूद था वो अपनी खिचड़ी अलग बना कर मजे से खाता है क्योंकि वो आदिवासियों में पुरोहित (बेगा कहलाने वाला)का काम करने वाला है और किसी का छुआ नहीं खाता। :) ]


एक तीसरी किताब 'नेगलभी पढ़ रहा हूँ। बाबा आम्टे के पुत्र प्रकाश आम्टे द्वारा अनाथ हो गए जंगली जानवरों के पालने के अनुभव पर आधारित ये भी बड़ी प्यारी और न्यारी किताब है। उनके सहयोगी विलास मनोहर ने लिखी है और नेशनल बुक ट्रस्ट ने छापी है। 

Friday 10 July 2009

पढ़ने का सुख

पढ़ी थी बरसों पहले ये किताब । नाम याद नहीं था बस इतना याद था कि कुछ मीठा सोता बहा था मन में तब । कुछ भाव अटके थे , कोई देहात का गीत फँसा था , कुछ जगमागाते धूप में नहाई दुनिया की चकाचौंध थी । साल बीते पर उमग उमग कर मित्रों से किताब की बात की और शर्म में भी डूबी कि याद नहीं नाम । ऐसा भी होता है ? अधिक प्यार में प्रिय का चेहरा ही भुला देना । फिर कुछ अप्रत्याशित संयोग से किताब मिली । कुछ ऐसे जैसे फूलों के जंगल से उस एक नन्हे फूल को खोज निकालना । फिर जब हाथ में आ गई तो भय हुआ कि इस बार किताब से मेरा संबंध किस तरह का बनेगा । तब से अब में दुनिया धुरी पर कई बार घूम चुकी थी । साहित्य और जीवन को समझने के मेरे सब औजार बदल चुके थे । साहित्य समझने में मैंने एक प्रकार की दूरी भी इज़ाद की थी । भोले उत्साह की जगह शब्दों से डीटैच्ड ऑबसर्वर का संबध स्थापित कर लिया था । मैं थोड़ी जेडेड हो गई थी । शिल्प कथ्य फॉर्म पर मेरा ध्यान जाता । मैं शब्दों से उपजे भाव और खेल के प्रति निर्मम हो गई थी । एक भोले नेह का रिश्ता खत्म हुआ , मेरी उदारता खत्म हुई । मैं किसी कारीगर की कुशलता देखना चाहती , उस कुशलता से उपजे रस की अंवेषणा करती । किताब एक जादूई दुनिया के सृजन के बजाय महीन कारीगरी के मेहनती क्राफ्ट में बदल गया जैसे । इस भोलेपन का खोना दुखद था , उदासी भरा । कुछ कुछ वैसा जैसे फिल्म देखते वक्त हर समय इस बात का चौकन्नापन- कि इस फ्रेम को और बेहतर कितने तरीकों से शूट किया जा सकता था – का बोझ निर्बाध रूप से आपके देखने के सुख को बाधित करता रहे । ये शायद बड़े होने की प्रक्रिया थी । मन से और समझ से बड़े होने की । इस बड़े होने में कुछ तत्व छूट जाने का दुख था । जीवन ऐसा है , मन ऐसा है , ऐसा ही होना नियत है और इस नियत से उपजे दुख का क्लीशे , ऐसी उदासी खत्म कर दे ऐसा भी नहीं था ।


किताब कैसी हो , सोचते ही लगता जैसे कोई पूरा जीवन हो , जिसमें ढेरों पगडंडियाँ हों , बीहड़ जंगल हो , कूँये से निकला मीठा जल हो , खारे आँसुओं की गमक हो , ठहरा हुआ मासूम सुख हो , छाती में धँसा दुख हो , राग हो रंग हो , छोटी छोटी मीठी बात हो , चुप्पी से उपजा गीत हो , शैतानी बदमाशी हो , सब हो । और सब ऐसे सरल प्रवाह में हो कि उसके पीछे की कारीगरी दिखे न । जैसे मंसूर का गायन । जैसे विलम्बित तान की तैयारी । जैसे बड़े ब्रश के बाद महीन पतले ब्रश से फाईनर स्ट्रोक देना । जैसे मीठा कोई तूम तूम तन ना का तराना । जैसे बरसात के दिनों के सीलेपन में सूखे कपड़ों का पहनना ।



ऐसे बदलाव को हाथ में थामे किसी धूप नहाये पोखर में नाक बन्द करके छलाँग मारने का तुक बनता नहीं था । कोथाय पॉबो तारे ? कहाँ पाऊँ उसे ? सात सौ पन्ने की किताब और अंत तक उसका नाम नहीं मालूम जिसकी कहानी है । न , कहानी कहना गलत है । जो जीवन में ऐसे धँसा बसा है कि जितना विलग है उतना ही रमा भी है । जीवन और मनुष्य और उसकी प्रकृति ..बस यही गीत है । समरेश बसु की ये किताब अद्भुत रस का स्वाद है । उस भोली ठहरी खुशी का एक बार फिर आस्वादन है । जब समय का ऐसा बोध हो कि समय ही न रहे , उसकी पाबंदी न रहे , ऐसे किसी दिन में , धूप से आँखे बचाये , बोलपुर , राढ़ प्रदेश , बक्रेश्वर जाने कहाँ कहाँ बाउलों की संगत में जीवन को समझना , स्त्री पुरुष के मन को समझना , डोंगी पर सवार , पानी के हिचकोलों की गोद में किसी अनजान गंतव्य की ओर बहते जाना ..ऐसा आनंद है , जहाँ न मिलने का दुख , खोजते पाने के सुख में डूब जाता है । इस किताब में कहानी जैसा कुछ नहीं है । इस किताब में कोई खेल नहीं है , शब्दों का कोई जादू नहीं है । कोई कहे कि एक हिस्सा पढ़ कर सुनाओ तो ऐसा कोई एक तीखा चमकीला जादू से भरा हिस्सा नहीं है । अनुवाद की वजह से एक क्वेंट सी बांगला मिश्रित हिन्दी है । स्त्री पुरुष के आपसी संबंध की अजीब गूढ़ और फिर उतनी ही सरल , एक स्तर पर पुरातन फिर तुरत दूसरे स्तर पर एकदम सब्लाईम और खुली परिभाषा है । फिर जीव और ईश्वर और प्रकृति की बात है । उस चीज़ की हुमक है जिसे परसीव कर पाने तक की समझ हो , खुशनसीबी है |

समरेश बसु की "कहाँ पाऊँ उसे" , भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित है

Monday 4 May 2009

किस्म-किस्म के आम | TSALIIM

किस्म-किस्म के आम TSALIIM
आम की बहुत अच्छी जानकारी दी है आपने, धन्यवाद

Thursday 9 April 2009

चांगदेव के आनन्‍दोत्‍सव

“कहीं तो कुछ कमी रहनेवाले लोग अपने-आप जीने के स्‍तर को अधूरा मानकर उसके ऊपर कोई स्‍तर है क्‍या ढूंढ़ते रहते हैं. चांगदेव, नारायण, शंकर और नाम्‍या वगैरा छोकरे इसलिए रुचि ले-लेकर साहित्‍य, नाटक, सिनेमा पर बहुत ही अच्‍छा बोलते. बापू को एक अखबार में सिनेमा-नाटक पर लिखने का कॉलम मिल गया था. इसलिए वह भी अब इनके बीच कायम रहता. कोई तो एकाध दिन देशी ठर्रा ही पिलाता. नाक बन्‍द करके ही क्‍यों न हो लेकिन पीना चाहिए इस जिद से सब पीते और रात-भर बकते फिरते.

कभी गांजा पीते, कभी भांग, यह सब ऊपर का स्‍तर प्राप्‍त करने के आसान रास्‍ते थे. बम्‍बई में हर चीज आसानी से मिल जाती. और एक आसान तरीका था कागज और स्‍याही. इसलिए ज्‍यादातर लोग कुछ-न-कुछ लिखते रहते. प्रधान और बापू तो कॉलम लिख-लिखकर चारों तरु अग्रणी लेखक के रूप में विख्‍यात हो रहे थे. शंकर कहता इनको जो पब्लिसिटी मिलती है वही ज्‍यादा है. पैसे वगैरा मिले यह कामना तो उंगली पकड़कर पहुंचा पकड़ने जैसी है. बाकी सभी कलाएं महंगी होती गईं, इसिलिए यह साहित्‍य कला इन सबके चंगुल में फंस गई! सीधे-सादे लोग जब प्‍यार करते हें और जब उनका प्रेमभंग हो जाता है अच्‍छी सी कविताएं लिख जाते हैं. जीवन भर उतना एक गमला मन-ही-मन महकाते रहते हैं. फिर बम्‍बई के फुटपाथ पर चार आने में नोबेल पुरस्‍कार प्राप्‍त करनेवालों की पचासों किताबें मिल जाती हैं. तब ये सब लोग निष्‍णात साहित्‍यकार तो होंगे ही.”

“हिन्‍दी फिल्‍में भी बीच-बीच में अच्‍छी होतीं. उस समय बर्मनदा भी जोश में थे. किशोरकुमार अपने फॉर्म में था ही. वहीदा रहमान भी बेहद जोश में थी. ऐसे में फेल्लिनी की फिल्‍म ला दोल्‍चे विता भी लगी थी. चांगदेव को अब सच्‍ची-झूठी दुनिया की मिलावट बहुत ही अद्भुत लगने लगी. सारी दुनिया से घृणा करते रहने की कोई वजह नहीं थी. क्‍योंकि इसी दुनिया में चार्ली चैपलिन है, सत्‍यजित और ऋत्विक है किशोरकुमार और आइएस जौहर है. वहीदा और गुरुदत्‍त हैं. अली अकबर और बड़े गुलाम हैं. अभी बिल्‍कुल इस घड़ी जिन्‍दा हैं. इन लोगों ने भी हमारे समान ही जीवन के स्‍वरूप को अवश्‍य ही जाना होगा. सच तो यह है कि यह जिन्‍दगी फेल्लिनी की फिल्‍मों जैसी मीठी जिन्‍दगी है. जीते रहना है जितने दिन मीठी मानकर चलना. गीत सुनते, किताबें पढ़ते, फिल्‍में देखते, हम भट्ठी की शराब पीते, सिगरेट फूंकते इस और उस दुनिया का मिश्रण कर जीते रहना. नूरजहां जैसे, मुहब्‍बत करें खुश रहें मुस्‍कराएं ऐसे कहकर नाचते-गाते हर पल जैसा है वैसा ही भोगते रहना. कड़वाहट मन में रखने से कम तो नहीं होती. कड़वाहट को अन्‍दर भींचकर ऊपर ऐसे फूल खिलाते रहना. आखिर हैं कितने दिन? सच तो यह है कि एक हद तक कड़वाहट को पचाए बिना जीवन इतना मीठा हो ही नहीं सकता. इसके अलावा बड़ी-बड़ी अनुभूतियों का आकलन भी नहीं होता. इसीलिए तो युद्धों से उबरे लोग महाभारत, इलियड लिख बैठे. सभी कलाकारों को कुछ-न-कुछ दुख होगा ही. मुझे भी है. इसीलिए तो इन कलाकृतियों का पूरा आकलन होता है. शंकर को भी कुछ-न-कुछ दुख होगा ही. वह मुझे बताता नहीं. मैंने भी तो उसे कहां बताया है?”

“..फिर से यह सब. फिर से दिन. फिर से फुर्र करते ही फूलनेवाले गुब्‍बारे जैसा जीवन छाती में.. मैं अब तक बड़ी उम्‍मीद से दुख सहता रहा अब बड़ी उम्‍मीद के साथ यह जीना भी जी लेंगे. जीवन के साथ सम्‍बन्‍ध तोड़ना नहीं- वह मजबूती के साथ जकड़ा रहता है. और हर चीज अगर प्रचंड बुरी है तो‍ फिर अब सब खराब ही है यह मानकर खुशी के साथ जिया जाए. पहले मृत्‍यु का विकार आत्‍यन्तिक था, अब जीने का विकार आत्‍यन्तिक मानकर चलना. दोनों सिरे होश में रहकर देखना हो जाएगा. जंग के दिन खत्‍म अब आनन्‍दोत्‍सव.”

(मराठी में 1975, और हिन्‍दी में अनुदित होकर 2003 में राजकमल द्वारा प्रकाशित भालचंद्र नेमाडे के मशहूर उपन्‍यास 'बिढार' से सहज उत्‍साह में यहां-वहां से उठायी पंक्तियां)

Thursday 16 October 2008

तिलकुट-हिलकुट

जय गोविन्‍दम्, जय गोपालम्
जय अकालम्, जय अकालम्.

गली-गली में शोर है
अदिगवा बुकरचोर है.

बुकर खरी का बोरा है
निजविभोर रस-होरा है.

चिरकुटई चापाकल महानद कहाया
संवेद-दलिद्दर करिखा मगध सजाया.

Sunday 24 August 2008

इसे रात मत कहो

डोंट कॉल इट नाईट

लेखक: अमोस ओज़

प्रकाशक: विंटेज

उन्नीस सौ नवासी नेगेव डेज़र्ट , तेल केदार .... गर्मियों का मौसम । छोटा सा सेटलमेंट । लम्बे समय तक साथ रहने वाले साठ साल के सिविल इंजीनियर थियो और उनसे काफी छोटी स्कूल टीचर नोआ के बीच का बिखरता टूटता प्रेम संबंध । नोआ का छात्र इमानुएल की मुश्किल समय में अचानक मौत और उससे आये तूफान को झेलता तेल केदार का समुदाय और उस तूफान के बीच में नोआ और थियो ।

अमोस ओज़ के कहन में नाज़ुक बारीकी है , शाम का धूसर धुँधलाया रंग है , एक चटक उदासी है , रेगिस्तान का विस्तार है । जैसे बीती रात के अँधेरे में किसी खराशदार आवाज़ की संगत में किसी तकलीफ भरी दास्तान का बिना उतार चढ़ाव किस्सा हो , जब समय का हिसाब न हो , जब उँगली बढ़ाकर आप लोगों को छू सकें , उनकी तकलीफ अपनी आत्मा पर महसूस कर सकें । ऐसी ही कहानी अमोस कहते हैं । उलझती महत्त्वकांक्षा का, टूटते संबंधों का , छोटे कस्बे के आम जीवन का , मन के अंतरलोक का । और इतने प्यार से कहानी कहते हैं , इतने नज़ाकत से , ऐसे सरल हास्य से कि संबंध की बुनावट अपने हरेक परत और रेशे में जितनी उजागर होती है उतनी ही गोपन भी होती जाती है ।

अमोस ओज़ के बारे में:



और इसका एक पन्ना सुनिये:



एक और:



( कोना बहुत दिनों से खाली था । फिर लगा कि किसी भी किताब की चर्चा की जाये । रविन्द्र व्यास ने वेब दुनिया में किताबी कोना के बारे में लिखते हुये गीत चतुर्वेदी की टिप्पणी से समापन किया था ..जो सही लगा । तो हिन्दी न सही अंग्रेज़ी या कोई और भाषा ही सही ..लिखें हमसब ..सन्नाटे को तोड़ते रहें .. बताते रहें कि पढ़ाई है निरंतर )

Tuesday 15 April 2008

भीष्म साहनी की "मेरे साक्षात्कार"


किसी भी लेखक की रचनायें ही लेखक का प्रतिनिधित्व करतीं है लेकिन उक्त लेखक से जुड़े संस्मरण, रचना यात्रा, निजी संघर्ष भी लेखक की रचनाओं से कम नहीं होता. रेणु जी की रचनावली या परसाई जी की रचनावली में हम सिर्फ उनकी रचनाओं से ही परिचित नहीं होते बल्कि उस समूचे कालखंड की यात्रा कर डालते हैं.

भीष्म साहनी के विभिन्न अवसरों पर लिये गये 27 साक्षात्कारों का संकलन मेरे साक्षात्कार हमें भीष्म साहनी की रचना यात्रा से परिचित कराता है.

बकौल भीष्म साहनी जी, "गप्प शप्प का अपना रस होता है. इस गप्प शप्प में हम सांस्कृतिक क्षेत्र में चलने वाले कार्य कलाप, लेखक के आपसी रिश्ते, उन्हें परेशान करनेवाले तरह तरह के मसले, उनके जीवन यापन की स्थिति, उनके आपसी झगड़े और मन मुटाव आदि आदि हमारी सांस्कृतिक गतिविधि से पर्दा उठाते है और हम लेखक को हाड़ मांस के पुतले के रूप में देख पाते हैं. लेखक अपनी इन कमजोरियों के रहते अपनी लीक पर चलता हुआ सृजन के क्षेत्र में कहीं सफल और कहीं असफल होता हुआ अपनी इस यात्रा को कैसे निभा पाता है, इसे हम उसके जीवन के परिप्रेक्ष्य में देख पाते हैं"

फैसला: जरूर जरूर जरूर पढ़िये.

किताब का नाम: "भीष्म साहनी : मेरे साक्षात्कार"
प्रकाशक: किताब घर 24 अंसारी रोड नई दिल्ली
वर्ष 1995
मूल्य रु.150.
आईएसबीएन: 81-7016-320-X

अरे, ओ तोप के पोपचिओ, सुनते हो, कान के बहरिओ?..

इस ब्‍लॉग के अपने आखिरी पोस्‍ट पर आयी एक प्रतिक्रिया के जवाब में भैया चंद्रभूषण ने ज़रा झल्‍लायी आवाज़ में हिंदी किताबी कोने की दिनों-दिन बेहाल होते हाल की शिकायत दर्ज़ करवायी थी.. और ग़लत नहीं करवायी थी.. इन गुज़रे चंद महीनों में अपने किताबी कोने की स्थिति कमोबेश वैसी ही हो चली है जैसे छोटे शहरों में (या कहें, अब तो हर जगह?) हिंदी किताबों की दुकान पर उपलब्‍ध साहित्यिक दोने में जैसे सुख कम, टोटके और टोने ज़्यादा मिलते हैं.. तो कुछ उसी अंदाज़ में बीच-बीच में हम कुछ टोने-टोटकों से किताबी कोने को जियाये हुए हैं.. इस तरह किताबी कोना जीता रहेगा, मगर कुछ उसी तरह जीता रहेगा जैसे बहुत सारे राष्‍ट्रीयीकृत बैंकों की सालाना हिंदी पत्रिकाएं जीती रहती होंगी?..

लेकिन अपने हिंदी किताबी कोने की इस कछुआ चाल की आखिर दिक़्क़त क्‍या है? दस जो यहां घोषित तोपची दिख रहे हैं, और सब किताबों को लेकर उत्‍साहित रहनेवाले जीव हैं, हुआ क्‍या है सबने किताबें पढ़नी बंद कर दी हैं? या ऐसा गुप्‍त साहित्‍य पढ़ रहे हैं कि उसकी इस ब्‍लॉग पर चर्चा से उनके पसीने छूटने के ख़तरे होंगे? या कि दिक़्क़त सचमुच यह है कि बेर-अबेर जब कभी पढ़ना हो ले, ज़रूरी नहीं कि पाठ्य-सामग्री हिंदी की होती हो? भई, ऐसी मुश्किल में माफ़ कीजिएगा मैं खुद के अनुभवों से सामान्‍यीकरण करने को मजबूर हो रहा हूं, सो कर रहा हूं- कि अपना पढ़ना तो होता रहता है मगर ज़रूरी नहीं कि हिंदी में होता हो. कुछेक महीनों से जो बारह-पंद्रह किताबों की संगत चल रही है उसमें हिंदी की सिर्फ़ एक किताब है, अमृतलाल नागर का उपन्‍यास- खंजन नयन, और उसका वाचन भी अटक-अटक कर ही चल रहा है..

तो भइय्या, हिंदी किताबों के लाड़ले प्‍यारे तोपचियो.. व ढिंढोरचियो.. सच्‍चायी और समस्‍या यह है कि आप, हमारी तरह, हिंदी में ख़ास कुछ पढ़ ही नहीं रहे हैं? भइय्या लोगो, समस्‍या अगर यह है तो सीधे-सीधे कहते, ब्‍लॉग के नाम से हम ‘हिंदी’ कबार कर उसे महज़ ‘किताबी कोना’ बनाये दिये होते? क्‍योंकि दिलअज़ीज़ दोस्‍तो, जीवन में क्रियात्‍मक नहीं तो कुछ ज्ञानात्‍मक गतिविधि चलती तो रहे? अब जैसे क्रिस हरमन के लिखे इसी इतिहास की किताब को लीजिए, भारी किताब पौने चार सौ की दिखी तो कम से कम एक चौथाई अपने काम की होगी सोचकर जिज्ञासावश मैंने उठा लिया, घर लौटकर उलटना-पुलटना शुरू किया तो एकदम से प्रसन्‍न हुआ कि यह तो मज़ेदार चीज़ निकली, भई! कोई अनुवादक प्रेमिका होती तो उसे चट् से कहता इसे हिंदी में तैयार करने के लिए जुट जा, कि कुछ ज्ञानात्‍मक देहातियों का भला हो? ख़ैर, वह बाद की बात है, फ़ि‍लहाल अभी आपको सूचित तो कर ही रहा हूं, दिल्‍ली या जहां कहीं ऑरियेंट लॉंगमैन की किताबें लहा सकते हैं, बाबू क्रिस हरमन की ‘अ पीपुल्‍स हिस्‍टरी ऑव द वर्ल्‍ड’ का पता कीजिए और पौने चार सौ खर्च करके न केवल घर ले आइए, बल्कि जल्‍दी पढ़कर निपटा भी डालिये! मज़ेदार है, आपने उत्‍साह दिखाया तो जल्‍दी उसके एक-दो हिस्‍सों से क्‍वोट भी यहां चढ़ाता हूं..

बाकी एक दूसरे काम की, मेरे, चीज़ यह है कि एक फ्रांसीसी, ज़रा अनकन्‍वेंशनल, इतिहासकार नज़र पर चढ़े हैं, मगर उनकी किताबें हाथ नहीं चढ़ रही.. किसी तरह आपके हाथ चढ़ सकती हो तो कृपया मुझ गरीब को सूचित करें..

और इस ‘हिंदी’ और ‘किताबी’ और ‘कोने’ का ठीक-ठीक क्‍या करना है ज़रा ठीक-ठीक बतायें.. कहां हो, भइय्या यूनुस मियां.. और पीरहरंकर भैयाजी?.. ऐसे जनता की लाइफ़बेरी चलाइएगा आप लोग? कुछ शरम-टरम है कि नहीं? कि अप्रैल की गरमी में उसको भी रूह-अफज़ा के शरबत में धोकर पी गए हैं?..

Wednesday 9 April 2008

कौन देस से 'देशनिकाला'

फिल्मी दुनिया के इर्दगिर्द बुनी गई रचनाएं हिंदी में ज्यादा नहीं हैं और जो हैं वे सहज नहीं हैं। सुरेंद्र वर्मा की 'मुझे चांद चाहिए' हिंदी में अबतक सुपरहिट गए कुछ चुनिंदा उपन्यासों में गिनी जाती है। इसे शास्त्रीयता और सड़क के बीच का एक पुल भी बताया गया, लेकिन दस साल बाद यदि इसका पुनर्पाठ करें तो आश्वस्ति भाव कम हो जाता है। बहुत सारे स्टीरियोटाइप्स को लेसने वाली मठारी हुई भाषा, जो श्रीलाल शुक्ल की 'राग दरबारी' और मनोहर श्याम जोशी की 'कुरु-कुरु स्वाहा' के बाद खुद को शेष कर चुकी है। आप पढ़ते हैं और पाते हैं कि उपन्यास में दूसरी बार खोजने के लिए कुछ भी नहीं है। छिटपुट कुछ और उदाहरण लिए जा सकते हैं लेकिन हिंदी मनोजगत में सिनेमा का जितना बड़ा दखल है, उस हिसाब से साहित्य में कैंड़े का कुछ भी मौजूद नहीं है।

धीरेंद्र अस्थाना के 'नया ज्ञानोदय' में प्रकाशित हालिया उपन्यास 'देशनिकाला' से यह कमी पूरी होती है, सो बात नहीं है। कायदे से संबोधित भी होती है या नहीं, यह बात भी पूरे भरोसे के साथ नहीं कही जा सकती। लेकिन एक 'लार्जर दैन लाइफ' दुनिया को उसके औसत कद में आम इन्सानी नजर से देख पाने की संभावना इस उपन्यास में जरूर मौजूद है। फिल्मी दुनिया इस किताब में महज एक पृष्ठभूमि की तरह मौजूद है, ठीक वैसे ही जैसे मुंबई शहर की जीवंतता। लेकिन पैसे और महत्वाकांक्षा का एक महाभंवर जब आपको खींच रहा होता है, तब भी दुनिया की और किसी भी जगह की तरह आप अपना स्वतंत्र अस्तित्व कैसे बनाए रख सकते हैं, इस नोडल प्वाइंट की खोजबीन इसे फिल्मी दुनिया के शरीर के बजाय इसकी आत्मा के ज्यादा करीब ला देती है।

अगर कोई इस उपन्यास में हकीकत खोजने चले तो उसे हताशा हाथ लगेगी। शोभा डे अपने उपन्यासों में जिस दुनिया को पछीट-पछीट कर धोती हुई अपने पूरे रचनाकर्म को ही कमोबेश एक धोबीघाट बना देती हैं, वह दुनिया इसमें कहीं नजर नहीं आती। उसका टुच्चापन, उसकी गलाजत, उसके महिमामंडित मनोरोग इस उपन्यास की विषयवस्तु को कहीं से छूते तक नहीं। इन सारी चीजों की उपस्थिति इसमें सिर्फ इतनी है कि ये शहर को तीन तरफ से घेरे समुद्र की तरह बिना नजर आए दूर ही दूर से अहर्निश हरहराती रहती हैं। न इनकी कहीं निंदा होती है, न स्तुति की जाती है। ये यहां वैसे ही हैं, जैसे दिल्ली में नेताओं की नेतागिरी और दलालों की दलाली- हवा की तरह ज्यादा तंग किए बगैर चौगिर्द बहती हुई।

कहानी कभी रंगमंच से जुड़े चालीस के लपेटे में चल रहे एक युगल की है, जो कुछ दिन लिव-इन में साथ रहने के बाद फिलहाल अलग-अलग रह रहे हैं। नायिका स्टेज के बरक्स फिल्मी दुनिया को अग्राह्य नहीं मानती, हालांकि वहां कुछ शुरुआती टपले खा लेने के बाद एक अर्से से वह ट्यूशन पढ़ाने में मुब्तिला है। जबकि नायक अपने आदर्शवाद में कुछ दिन और रंगमंच के लपेटे में रहकर फिलहाल फिल्मों की स्क्रिप्ट राइटिंग में हाथ आजमा रहा है। बीच-बीच में दोनों का मिलना-जुलना भी हो जाता है, लेकिन रिश्तों में गर्मी नहीं पैदा होती। संयोग से एक बार नायक की एक कोई चीज फिल्मी दुनिया के एक नए फार्मूले में अंट जाती है और जिंदगी की राह रवां हो जाती है।

नायक के हाथ में दो पैसे आते हैं तो उसे वारिस की चिंता सताती है। नायिका को फोन करता है तो उसे शुरू में यह बेतुकी सी बात लगती है। लेकिन संयोग ऐसा कि उसी समय किसी और नए फार्मूले में उसके अभिनय के लिए भी जगह निकल आती है। सारा किस्सा किसी परीलोक जैसा है। इधर फिल्म मिलती है उधर इसी खुशी में वह मां बनने की राह पर निकल पड़ती है। करीअर या बच्चा जैसे घनघोर दुविधा वाले कुछ क्षण भी आते हैं लेकिन यह टकराव जानलेवा नहीं बनता। फिल्मी दुनिया में अब बाल-बच्चेदार हीरोइनों के लिए भी गुंजाइश बनने लगी है। अपनी दूसरी फिल्म में ही, जब वह प्रसिद्धि और उत्कृष्टता के चरम पर होती है, तो उसे छोड़कर वह अपने ट्यूशनों और अपनी बेटी की दुनिया में ही मगन रहने का फैसला लेती है।

एक समय का आदर्शवादी नायक अब फिल्मी दुनिया की अंतरंग महफिलों और राजनीति का हिस्सा बन चुका है। नायिका का फैसला उसे अहमकाना लगता है। साथ रहने की संभावना एक बार फिर समाप्त हो जाती है और मां-बेटी अपने 'देशनिकाले' की लय तलाशती रह जाती हैं। (किसका देश और काहे का देशनिकाला? जब फिल्मी करीअर के चरमोत्कर्ष पर उसे छोड़ देने जैसा बड़ा फैसला नायिका द्वारा लिया जा चुका है और अपनी मर्जी का एक 'देस' उसने पहले से ही रच रखा है तो खामखा रोने-बिसूरने के लिए इसे देशनिकाले का नाम देना जबर्दस्ती की नारीवादी ज्यादती नहीं तो और क्या है?)

एकबारगी लगता है कि इस उपन्यास में यथार्थ के बरक्स फैंटेसी कुछ ज्यादा ही हावी हो गई है। कहीं यह मुंबई फिल्म उद्योग की बेरहम दुनिया का महिमामंडन तो नहीं? लेकिन इन्सानी फैसलों को अगर इन्सानी दुनिया से जुड़ी किसी भी कहानी का मूल तत्व समझा जाए तो इस उपन्यास के कुछ बड़े मायने भी बनते हैं। सकारात्मक बातें इससे ज्यादा नहीं की जा सकतीं। क्लासिकी, बल्कि श्रेष्ठतर रचनाओं की खासियत मानवीय निर्णय और मानवीय नियति के जिस टकराव में खोजी जाती है, उसे निबाहने का धैर्य इस रचना में (सिरे से न भी सही तो) लगभग नदारद है।

निजी बातचीत में लेखक इस अधैर्य के लिए कुछ लेखकीय उलटबांसियों और कुछ प्रकाशकीय दबावों को जिम्मेदार ठहराते हैं। यह उपन्यास दरअसल राजेंद्र यादव और धीरेंद्र अस्थाना के साझा प्रयास के रूप में लिखा जाना था। अपने हिस्से के दस-बारह पन्ने लिखकर राजेंद्र जी ने दिल्ली से धीरेंद्र जी के पास मुंबई भेजे भी लेकिन वहां जिस मुकाम से रचना आगे बढ़ी उसका कोई तरल संबंध शुरुआती हिस्से के साथ नहीं बन पाया (वैसे भी 'तरल' संबंध रचनाकारों में संध्याकालीन सभाओं के दौरान जितनी आसानी से बन जाते हैं उतनी आसानी से रचनाओं के बीच कहां बन पाते हैं)।

फिर हारकर धीरेंद्र जी को शुरुआती हिस्सा भी नए सिरे से लिखना पड़ा। इधर 'नया ज्ञानोदय' के संपादक रवींद्र कालिया उपन्यास छपने की तिथि घोषित कर चुके थे, लिहाजा जो 'फाइनल ड्राफ्ट' तबतक बन पाया था वह पत्रिका के पैंतालीस पृष्ठों में छप गया। रचना इस रूप में भी दिलचस्प है। भाषा में पत्रकारिता की रवानी है (मुंबई की महाबरसात की महा-रिपोर्टिंग इस प्रस्थापना की पुष्टि कुछ ज्यादा ही शिद्दत से करती है) और अंतिम एक-दो पैराग्राफों को छोड़कर फिल्मी या साहित्यिक स्टीरियोटाइप भी कहीं नजर नहीं आते। लेकिन जबतक किताब के रूप में नहीं छपती तबतक इसे घर की लड़की घर में ही रहने जैसी बात समझा जाना चाहिए। पुस्तकीय रूप में आने तक अंतिम टुकड़े पर कुछ और काम कर लेने में मुझे कोई बुराई नहीं नजर आती।